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बहुसांस्कृतिक समाज में सुशासन और सामाजिक परिवर्तन विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

5/18/2026 5:39:58 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
आरा: वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के लोक प्रशासन विभाग द्वारा सोमवार को “बहुसांस्कृतिक समाज में सुशासन और सामाजिक परिवर्तन” विषय पर एक दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष रमेश सिंह के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने कहा कि यह विमर्श केवल शैक्षणिक चर्चा नहीं, बल्कि वर्तमान समय की सामाजिक चुनौतियों का समाधान खोजने का प्रयास है। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्र की असली ताकत बताया। मुख्य अतिथि कुलसचिव रामकृष्ण ठाकुर ने कहा कि बहुसांस्कृतिक समाज जैसे संवेदनशील विषय पर निरंतर समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने सामाजिक असमानता, सांस्कृतिक तनाव और आर्थिक विषमता को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बताते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को सकारात्मक सामाजिक विमर्श को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। ए.एन. कॉलेज, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की लोक प्रशासन विभागाध्यक्ष डॉ. कविता ने संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय की भावना पर प्रकाश डाला। उन्होंने राजा राममोहन राय, ज्योतिराव फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक योगदानों का उल्लेख करते हुए कहा कि 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने基层 लोकतंत्र को मजबूत किया है और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि की है। लोक प्रशासनविद् उमेश कुमार ने एफ.डब्ल्यू. रिग्स के ‘प्रिज्मीय समाज’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय समाज परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम है, जो इसे बहुसांस्कृतिक स्वरूप प्रदान करता है। भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, बिहार इकाई के सचिव आर.के. वर्मा ने सुशासन के व्यावहारिक आयामों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक नीतियों में स्थानीय भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को महत्व देना अनिवार्य है। भोजपुरी भाषा के आरा और छपरा के अंतर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि स्थानीयता को समझकर बनाई गई नीतियां ही प्रभावी साबित होती हैं। मगध विश्वविद्यालय, गया के लोक प्रशासन विभागाध्यक्ष डॉ. शमशाद अंसारी ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा को भारतीय समाज की आत्मा बताते हुए अमेरिका के मेल्टिंग पॉट और मेट बाउल सिद्धांतों की तुलना प्रस्तुत की। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता व पूर्व आईएएस अधिकारी विजय प्रकाश ने विविधता को थाली के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि जैसे अलग-अलग व्यंजन मिलकर भोजन को संपूर्ण बनाते हैं, वैसे ही विभिन्न समुदाय अपनी विशिष्ट कला, संस्कृति और कौशल से समाज को समृद्ध बनाते हैं। उन्होंने कहा कि विकास के लिए ब्रॉडस्ट्रीमिंग आवश्यक है, जिसमें हर समुदाय को सम्मान और अवसर मिले। पटना विश्वविद्यालय के लोक प्रशासन विभागाध्यक्ष राकेश रंजन ने कहा कि योग्यता किसी एक विषय पर निर्भर नहीं होती। समाज तभी प्रगति करता है, जब हर प्रतिभा को समान अवसर और सम्मान दिया जाए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आमिर महमूद ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रमेश कुमार ने प्रस्तुत किया। संगोष्ठी के दौरान 50 विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए और स्मारिका का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. धर्मराज मिश्र, अमरजीत कुमार, सुमन सौरभ, अंसल राज, कुमार आशुतोष, अमृता भारती, सुमन श्रीवास्तव, कुमारी सुलेखा, रॉकी सिंह, विवेक यादव, विष्णु कुमार, बबलू कुमार, नरेंद्र सिंह, रवि रंजन चौबे, रवि रंजन प्रसाद सहित बड़ी संख्या में शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। प्रमाणपत्र समिति के सदस्यों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
 
कोयलांचल लाइव के लिए गया से मनोज की रिपोर्ट