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दीपक प्रकाश के लिए खाली हुई राह, लेकिन सवालों के घेरे में राजनीतिक नैतिकता:चंदन चौरसिया

7/31/2026 5:54:23 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Patna : बिहार की राजनीति में एक बार फिर संवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रबंधन आमने-सामने दिखाई दिए। पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के कुछ ही घंटों बाद भाजपा विधान परिषद सदस्य देवेश कुमार का इस्तीफा सामने आना महज संयोग नहीं माना जा सकता। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि सरकार ने मंत्री पद बचाने के लिए राजनीतिक समाधान तलाश लिया है, लेकिन इससे कई नए सवाल भी खड़े हो गए हैं। इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कोयलांचल लाइव से बातचीत करते हुए  कहा की सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा था कि आखिर किस संवैधानिक आधार पर दीपक प्रकाश छह महीने से अधिक समय तक विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना मंत्री बने हुए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को इसका संतोषजनक जवाब देना होगा। अदालत की इस टिप्पणी के बाद सरकार पर संवैधानिक संकट गहराने लगा था। ऐसे में भाजपा के एमएलसी देवेश कुमार का इस्तीफा इस पूरे विवाद का तत्काल राजनीतिक समाधान बनकर सामने आया। मार्च 2027 तक कार्यकाल शेष होने के बावजूद उनका इस्तीफा यह संकेत देता है कि अब रिक्त हुई सीट से दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा जाएगा, जिससे उनका मंत्री पद सुरक्षित रह सके। हालांकि, इस फैसले ने एक अहम प्रश्न भी खड़ा कर दिया है—आखिर देवेश कुमार ही क्यों? भाजपा में लंबे समय तक संगठन की जिम्मेदारियां निभाने वाले देवेश कुमार का राजनीतिक सफर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। समस्तीपुर के मोहम्मदपुर देवपाट गांव से आने वाले देवेश कुमार स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता पंडित यमुना कारजी के पोते हैं। जेएनयू छात्र राजनीति से लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, पत्रकारिता और फिर भाजपा संगठन तक उन्होंने लंबी राजनीतिक यात्रा तय की। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के करीबी रहे देवेश कुमार को 2021 में राज्यपाल कोटे से विधान परिषद की सदस्यता मिली थी और संगठन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। ऐसे अनुभवी नेता का कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देना यह दर्शाता है कि पार्टी ने संगठनात्मक निष्ठा को प्राथमिकता देते हुए उनसे बड़ा राजनीतिक त्याग कराया है। यह फैसला भले ही पार्टी अनुशासन का उदाहरण बताया जाए, लेकिन विपक्ष के लिए यह सवाल उठाने का अवसर भी बन गया है कि क्या एक मंत्री को बचाने के लिए एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि का कार्यकाल बीच में समाप्त कर देना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? चौरसिया ने कहा की बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम केवल एक सीट खाली होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक जवाबदेही, राजनीतिक प्रबंधन और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन साधने की चुनौती का भी उदाहरण है। अब सभी की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या जवाब देती है और दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने की प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होती है।यह प्रकरण एक बार फिर यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में संवैधानिक मर्यादाएं केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता की भी कसौटी होती हैं।
 
कोयलांचल लाइव डेस्क