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350 साल की आस्था राजसी परंपरा का गौरव! डुमरा राजबाड़ी की दुर्गा पूजा आज भी कायम..

10/13/2026 3:12:13 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Baghmara : बाघमारा के डुमरा राजबाड़ी में इस वर्ष भी ऐतिहासिक और पारंपरिक विधि-विधान के साथ माँ शारदीय दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। पुजारियों और आचार्यों के अनुसार, यह पूजा लगभग 350 वर्षों से अधिक पुरानी है और इस क्षेत्र की सबसे प्राचीन दुर्गा पूजाओं में से एक मानी जाती है। आचार्य शीतल कुमार मिश्रा ने बताया कि इस पूजा की शुरुआत महाराजा प्रतापनारायण सिंह के समय हुई थी। इसके बाद उनके पूर्वजों राजा बनवारी लाल सिंह, राजा नीलकंठ नारायण सिंह, राजा कामाख्या नारायण सिंह, स्वर्गीय राजा सत्येंद्र नारायण सिंह और वर्तमान में उनके सुपुत्र व दुर्गा पूजा के सेवायत राजा मृगेंद्र नारायण सिंह की देखरेख में समस्त पूजा व्यवस्था संचालित होती है। पूजा-पाठ का पूरा खर्च आज भी राज परिवार की ओर से वहन किया जाता है जिसमे की सरस्वती कला केंद्र का भी अहम भूमिका रहती है। ​यहां शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक विशेष अनुष्ठान होते हैं। षष्ठी के दिन नवपत्रिका आमंत्रण और बिल्व वृक्ष के नीचे देवी का बोधन व अधिवास किया जाता है। ​षष्ठी के दिन परंपरा के अनुसार राजा स्वयं झाड़ू लगाकर और जल का प्रोक्षण कर नवपत्रिका को बिल्व वृक्ष तक ले जाते हैं। ​महासप्तमी को नवपत्रिका को पूर्वजों द्वारा बनाए गए ऐतिहासिक राजा तालाब में स्नान कराकर मंदिर की वेदी पर कलश स्थापित किया जाता है। अष्टमी की पूजा यहां सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दिन राजमाता और राज परिवार की महिलाएं अपने हाथों से अरसा पीठा और मोहन भोग सूजी, काजू, किशमिश युक्त तैयार कर माता को अर्पित करती हैं। ​यहां के आरती का विशेष महत्व है जिसमें दीपक, कपूर, अर्घ्य, धूप आदि कई तरह के उपचारों से विस्तृत आरती की जाती है। यहाँ सुबह एवं संध्या की आरती लगभग एक घंटे तक चलती है, जिसमें सैकड़ों बार अलग-अलग निवेदन अर्पित किए जाते हैं।   ​विजयादशमी के दिन क्षेत्र के आदिवासी भाई-बहन एकत्र होकर पारंपरिक बिसहरी नृत्य प्रस्तुत करते हैं। देवी का भार आने पर वे कलश का जल माथे पर लगाकर दंडवत प्रणाम करते हैं, जिससे यह आयोजन सामाजिक समरसता का प्रतीक बन जाता है। मंदिर में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण निचितपुर के मूर्तिकार कुलदीप रजवार द्वारा किया गया है। उन्होंने बताया कि उनके दादाजी और पिताजी के समय से ही उनका परिवार राजबाड़ी के लिए मां दुर्गा की प्रतिमा बनाता आ रहा है। आचार्य शीतल कुमार मिश्रा ने सभी भक्तों से अपील की है कि वे मंदिर परिसर में शांति और संयम के साथ पूजा-अर्चना करें तथा नारियल या अन्य सामग्री वेदी पर फेंकने के बजाय विधिपूर्वक अर्पित कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करें।
 
 

बाघमारा से  कोयलांचल लाइव के लिए काशीनाथ रवानी की रिपोर्ट