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दोनों हाथ नहीं हैं, पर हौसले आज भी जिंदा हैं: पैरों से मोबाइल चलाता है बृजेश, सैकड़ों बच्चों को शिक्षित कर इंजीनियर बनने का है सपना
6/29/2026 2:19:23 PM IST
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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Gaya
: कौन कहता है कि 'आसमान में सुराख नहीं होता, तबीयत से एक पत्थर तो उछालो यारों।' इस बात का जीता-जागता उदाहरण गया का बृजेश कुमार है। बृजेश के दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन उसके हौसले आज भी जिंदा हैं। संघर्ष और हिम्मत के दम पर उसने अपनी जिंदगी को नई दिशा दी है।
दोनों हाथ नहीं, पैरों से मोबाइल चलाता है बृजेश
गया के केंदुआ गांव का रहने वाला बृजेश दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद हार नहीं माना। वह पैरों से मोबाइल चलाता है, यूट्यूब देखता है, समाचार पढ़ता है और जरूरत के सभी मोबाइल ऐप का इस्तेमाल खुद करता है। इसके अलावा मुंह और कटे हाथ के सिरे की मदद से भी मोबाइल संचालित कर लेता है। इसके लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं पड़ती।
कटे हाथ को ही बना लिया शिक्षा का हथियार
बृजेश की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उसने अपने कटे हाथ के अंतिम सिरे को ही शिक्षा का हथियार बना लिया है। रबर की मदद से हाथ के सिरे में मार्कर बांधकर वह ब्लैकबोर्ड पर लिखता है और पहली से दसवीं कक्षा तक के बच्चों को निशुल्क पढ़ाता है। उसे पढ़ाते देखकर कहीं से नहीं लगता कि उसके दोनों हाथ नहीं हैं।
चर्चा का विषय बना बृजेश
पैर से मोबाइल चलाना, पैर से लिखना और कटे हाथ के सहारे ब्लैकबोर्ड पर बच्चों को पढ़ाना बृजेश को लोगों के बीच चर्चा का विषय बना चुका है। जिस जिंदगी को लोग बोझ समझते हैं, उसी जिंदगी को उसने संघर्ष और आत्मविश्वास से मिसाल बना दिया है।
इंजीनियर बनने का सपना अब भी जिंदा
बृजेश शुरू से मेधावी छात्र रहा है। मैट्रिक पास करने के बाद अक्टूबर 2015 में उसे 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया। वह बुरी तरह झुलस गया और करीब पांच साल तक इलाज चला। जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उसके दोनों हाथ काटने पड़े। शरीर के अन्य हिस्सों में भी गंभीर चोटें थीं, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। गरीब किसान-मजदूर परिवार से आने वाला बृजेश आज भी इंजीनियर बनने का सपना देखता है। आर्थिक तंगी के कारण वह नौकरी की भी तलाश कर रहा है और साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखे हुए है।
तीन साल से जगा रहा शिक्षा की अलख
पिछले तीन वर्षों से बृजेश अपने पैतृक गांव केंदुआ और ननिहाल मंझियावा में बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहा है। पहली से दसवीं तक के बच्चों को शिक्षा देकर वह गरीब परिवारों के बच्चों का भविष्य संवारने की कोशिश कर रहा है।
क्या कहते हैं बृजेश
बृजेश बताते हैं कि वर्ष 2015 में करंट लगने के बाद इलाज के दौरान उनके दोनों हाथ काटने पड़े। पांच साल तक इलाज चला और पढ़ाई भी छूट गई। बाद में उन्होंने फिर से पढ़ाई शुरू की। वर्ष 2023 में इंटर पास करने के बाद अब ग्रेजुएशन कर रहे हैं। वह बताते हैं कि इंजीनियर बनने का सपना आज भी बरकरार है, लेकिन कई जगह दिव्यांग होने की वजह से नौकरी के आवेदन तक स्वीकार नहीं किए जाते। उनका कहना है कि लोग यह मान लेते हैं कि बिना हाथों के वह काम नहीं कर पाएंगे। बृजेश कहते हैं कि वह सिर्फ खाना नहीं खा सकते, बाकी लगभग सारे काम खुद कर लेते हैं। पैरों से मोबाइल चलाते हैं, लिखते हैं और कटे हाथ के सिरे में रबर बांधकर मार्कर लगाकर बच्चों को पढ़ाते हैं। लगातार अभ्यास की वजह से उन्होंने यह सब सीखा है।
उनका कहना है कि उन्हें भरोसा है कि एक दिन उनका सपना जरूर पूरा होगा। बस सरकार और समाज उनके जैसे लोगों पर भरोसा करे और आगे बढ़ने का अवसर दे।
गया से कोयलांचल लाइव के लिए मनोज कुमार की रिपोर्ट
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