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100% अमेरिकी टैरिफ का खतरा: रूस से तेल खरीदना भारत को पड़ेगा कितना महंगा? जानें मोदी सरकार के सामने क्या हैं विकल्प

8/8/2026 5:19:47 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Patna : इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कोयलांचल लाइव से बातचीत करते हुए  कहा की अमेरिका में रूस और ईरान से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसके कानून बनने पर अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस और ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति मिल सकती है।
 
भारत के लिए यह मामला इसलिए बेहद अहम है क्योंकि रूस पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है। ऐसे में अगर अमेरिका इस कानून का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है तो इसका असर केवल भारत-अमेरिका व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। भारतीय निर्यात, कंपनियों के मुनाफे, विदेशी मुद्रा आय, महंगाई और देश की ऊर्जा सुरक्षा तक पर इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि, फिलहाल भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगना तय नहीं है। सीनेट से पारित विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी और उसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की जरूरत होगी। इसके अलावा कानून बनने के बाद भी राष्ट्रपति के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि किसी देश पर कितना शुल्क लगाया जाए।
यानी इस समय भारत के सामने तत्काल 100 फीसदी टैरिफ की स्थिति नहीं, बल्कि एक बड़ा संभावित आर्थिक और रणनीतिक जोखिम खड़ा हुआ है।
 
क्या है लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट?
अमेरिकी सीनेट में पारित विधेयक का नाम लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 है। इसे रूस और ईरान की ऊर्जा आय को सीमित करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
विधेयक के पीछे अमेरिकी तर्क यह है कि रूस को तेल बेचकर होने वाली कमाई उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है और यूक्रेन युद्ध के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराती है। इसलिए रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाकर मॉस्को की ऊर्जा आय को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
इसी तरह ईरान से तेल खरीदने वाले देशों को भी निशाने पर लेने का प्रस्ताव है।
सीनेट में इस विधेयक को 86 वोट मिले, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। भारी बहुमत से पारित होने के बावजूद इसकी अंतिम मंजूरी अभी बाकी है।
विधेयक की सबसे अहम बात यह है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस या ईरान से ऊर्जा खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 0 से लेकर 100 फीसदी तक अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की शक्ति देने का प्रस्ताव रखता है।
यानी यदि भारत इस दायरे में आता है और अमेरिकी प्रशासन 100 फीसदी शुल्क लागू करता है तो भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका में अपने उत्पाद बेचना बेहद मुश्किल हो सकता है।
 
भारत पर सबसे बड़ा असर कहां होगा?
भारत के लिए इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रूसी कच्चा तेल है। जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 55 फीसदी तक रही। पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के लिए प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
रूसी तेल की खरीद बढ़ने की एक बड़ी वजह इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत रही है। भारत ने पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के बीच उपलब्ध रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल अपनी रिफाइनरियों में किया और इससे तेल आयात की लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिली।
लेकिन यही रणनीति अब अमेरिका के नए विधेयक के कारण जोखिम में दिखाई दे रही है।
यदि भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिकी राष्ट्रपति भारतीय उत्पादों पर भारी शुल्क लगा देते हैं, तो अमेरिका में भारतीय सामान महंगा हो जाएगा।
इसका सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ सकता है जो अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर हैं। इनमें फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
 
100% टैरिफ का मतलब क्या होगा?
टैरिफ मूल रूप से आयातित सामान पर लगाया जाने वाला शुल्क है। उदाहरण के लिए, अगर किसी भारतीय उत्पाद की अमेरिकी बाजार में कीमत 100 डॉलर है और उस पर 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाता है, तो आयात शुल्क के स्तर पर ही उसकी लागत में 100 डॉलर का अतिरिक्त बोझ जुड़ सकता है।
हालांकि वास्तविक बाजार कीमत इससे अलग हो सकती है क्योंकि कंपनियां, आयातक और वितरक इस लागत को अलग-अलग तरीके से वहन कर सकते हैं।
भारतीय निर्यातकों के सामने ऐसी स्थिति में तीन विकल्प होंगे—कीमत बढ़ाना, अपना मुनाफा कम करना या अमेरिकी बाजार से पीछे हटना।
तीनों ही विकल्प भारतीय कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।
यदि कंपनियां कीमत बढ़ाती हैं तो अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों के सस्ते विकल्पों की तरफ जा सकते हैं। यदि कंपनियां कीमत नहीं बढ़ातीं तो उनका मुनाफा घटेगा। और यदि वे अमेरिकी बाजार से बाहर निकलती हैं तो उनके निर्यात कारोबार पर सीधा असर पड़ेगा।
 
रूस से तेल कम किया तो भारत को क्या नुकसान?
भारत के सामने दूसरा रास्ता रूसी तेल पर निर्भरता कम करने का है। लेकिन यह भी आसान विकल्प नहीं है।
यदि भारत रूस से कम तेल खरीदता है तो उसे इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और अन्य देशों से ज्यादा कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है। इनमें से कुछ स्रोत रूसी तेल की तुलना में महंगे हो सकते हैं।
उपलब्ध अनुमान के मुताबिक अगर भारत रूसी तेल की खरीद में करीब एक-तिहाई यानी 8 से 10 लाख बैरल प्रतिदिन तक कमी करता है तो वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदने पर सालाना करीब 1 से 1.8 अरब डॉलर का अतिरिक्त वित्तीय बोझ आ सकता है।
इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा।
महंगा कच्चा तेल केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतों का मामला नहीं है। तेल परिवहन, उद्योग, लॉजिस्टिक्स, प्लास्टिक, रसायन और कई दूसरे क्षेत्रों की लागत को प्रभावित करता है। इसलिए लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है।
भारत के लिए यह जोखिम ऐसे समय में और महत्वपूर्ण है जब पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों से प्रभावित हो सकती है।
यानी भारत के सामने एक तरफ सस्ता रूसी तेल है और दूसरी तरफ अमेरिकी बाजार तक पहुंच का जोखिम।
 
क्या भारत को रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद करना पड़ेगा?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
विधेयक में कुछ परिस्थितियों में संभावित टैरिफ से छूट का रास्ता भी रखा गया है। यदि कोई देश रूस से अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का 15 फीसदी से कम आयात करता है या रूस के कुल तेल-गैस निर्यात का 15 फीसदी से कम हिस्सा खरीदता है और अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा रहा है, तो उसे राहत मिल सकती है।
इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति को राष्ट्रीय हित में प्रतिबंधों से छूट देने की शक्ति भी मिलने की बात है।
भारत के लिए यही प्रावधान कूटनीतिक बातचीत का आधार बन सकता है।
नई दिल्ली अमेरिका के सामने यह तर्क रख सकती है कि भारत की विशाल आबादी और बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए रूसी तेल पर निर्भरता को अचानक खत्म करना व्यावहारिक नहीं होगा।
भारत चरणबद्ध तरीके से अपनी निर्भरता कम करने और तेल के स्रोतों को विविध बनाने की रणनीति अपना सकता है।
 
भारत पहले भी अमेरिकी दबाव के बावजूद खरीद चुका है रूसी तेल
भारत का पिछला रुख बताता है कि केवल अमेरिकी राजनीतिक दबाव के कारण नई दिल्ली तुरंत रूसी तेल की खरीद बंद करने की संभावना कम है।
अगस्त 2025 में जब ट्रंप प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त 25 फीसदी शुल्क लगाया था और कुल अमेरिकी टैरिफ 50 फीसदी तक पहुंच गया था, तब भी भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी।
हालांकि, जब सीधे रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए गए तो भारतीय रिफाइनरियों ने अपनी खरीद घटाई थी।
इससे यह संकेत मिलता है कि भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल अमेरिकी टैरिफ नहीं, बल्कि रूस की तेल कंपनियों, बैंकों, शिपिंग कंपनियों और बीमा नेटवर्क पर सीधे प्रतिबंध हो सकते हैं।
अगर ऐसी स्थिति आती है तो भारतीय कंपनियों के लिए रूसी तेल की खरीद, भुगतान और परिवहन तीनों मुश्किल हो सकते हैं।
 
अमेरिका में भी इस बिल को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी सीनेट से भारी बहुमत मिलने के बावजूद इस विधेयक को लेकर अमेरिका में भी विवाद है।
आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति को दूसरे देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक शक्ति देना अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
यदि आयातित सामान महंगा होता है तो उसका बोझ अंततः अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
व्यापारिक संगठनों का तर्क है कि भारी टैरिफ से सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और अमेरिकी बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं।
कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति की टैरिफ शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की, लेकिन सीनेट में ऐसा संशोधन सफल नहीं हुआ।
ईरान को लेकर भी राजनीतिक मतभेद हैं। कुछ सांसदों को चिंता है कि ईरानी तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की व्यापक शक्ति अमेरिकी विदेश नीति को और जटिल बना सकती है।
इसके अलावा अमेरिका के कुछ रणनीतिक साझेदार भी इस नीति की चपेट में आ सकते हैं। तुर्किये, ब्राजील और सिंगापुर जैसे देशों के साथ व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों पर इसका असर पड़ सकता है।
 
विधेयक की राह अभी कितनी लंबी है?
सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद भी विधेयक कानून नहीं बना है।
अब इसे प्रतिनिधि सभा से पारित होना होगा। वहां इसके प्रावधानों को लेकर बहस और संशोधन की संभावना है। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होगी।
अमेरिका में मध्यावधि चुनावों का समय नजदीक होने के कारण भी विधेयक की राजनीतिक राह आसान नहीं मानी जा रही है।
इसलिए अभी भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगने की बात को अंतिम फैसला मानना सही नहीं होगा।
लेकिन भारत के लिए खतरे को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
 
अब मोदी सरकार के सामने क्या हैं विकल्प?
भारत को इस चुनौती से निपटने के लिए एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा।
पहला, अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत बढ़ानी होगी ताकि भारत को किसी संभावित टैरिफ या प्रतिबंध से राहत मिल सके।
दूसरा, रूस पर ऊर्जा निर्भरता को अचानक खत्म करने के बजाय धीरे-धीरे अलग-अलग देशों से तेल खरीद बढ़ाकर आयात के स्रोतों में विविधता लानी होगी।
तीसरा, भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए यूरोप, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में नए बाजार तलाशने होंगे।
चौथा, सरकार को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जिन पर भारी अमेरिकी टैरिफ का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है और जरूरत पड़ने पर उनके लिए सहायता या वैकल्पिक बाजार की रणनीति तैयार करनी होगी।
 
निष्कर्ष: भारत के लिए यह सिर्फ टैरिफ नहीं, रणनीतिक संतुलन की परीक्षा
अमेरिकी सीनेट में पारित यह विधेयक भारत के लिए फिलहाल एक संभावित खतरा है, लेकिन इसे तत्काल लागू होने वाला 100 फीसदी टैरिफ समझना सही नहीं होगा। इसके लिए अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी है।
फिर भी यह घटनाक्रम भारत की उस चुनौती को उजागर करता है जिसमें एक तरफ देश को सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा चाहिए, जबकि दूसरी तरफ अमेरिका जैसे बड़े निर्यात बाजार के साथ आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत के लिए रूसी तेल छोड़ना ऊर्जा लागत बढ़ा सकता है और अमेरिकी टैरिफ स्वीकार करना निर्यात को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में सबसे व्यावहारिक रास्ता यही होगा कि नई दिल्ली ऊर्जा स्रोतों में विविधता, अमेरिकी प्रशासन के साथ बातचीत और नए निर्यात बाजारों की तलाश—इन तीनों रणनीतियों पर एक साथ आगे बढ़े।
आने वाले महीनों में यह तय होगा कि अमेरिकी विधेयक कानून का रूप लेता है या नहीं और यदि लेता है तो भारत के लिए इसका इस्तेमाल किस तरह किया जाता है। लेकिन एक बात स्पष्ट है—रूस से तेल खरीदने की भारत की नीति अब केवल ऊर्जा का फैसला नहीं रह गई है। यह भारत की आर्थिक सुरक्षा, विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुकी है।