Date: 27/06/2026 Saturday ABOUT US ADVERTISE WITH US Contact Us

Bharat Tiwari Encounter Update: 28 किलोमीटर... 8 दिन... और आधी रात का सस्पेंस! 

6/26/2026 1:55:52 PM IST

32
कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Bihar : बिहार के भोजपुर जिले का बिलौटी गांव इस वक्त देश भर की सुर्खियों में है। 17 जून को शाहपुर के बिलौटी गांव में हुए 30 वर्षीय समाजिक कार्यकर्ता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले ने अब एक बेहद दिलचस्प और संदेहास्पद मोड़ ले लिया है। इस मामले में जहां एक तरफ पटना हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज ने खुद ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है, वहीं भोजपुर पुलिस की लेटलतीफी और आधी रात के दौरे ने सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
 
ग्राउंड जीरो पर जज की एंट्री: खंगाला एक-एक सबूत
इस कथित फर्जी एनकाउंटर के बाद भोजपुर में जनता का गुस्सा फूट पड़ा. बिलौटी गांव में एक ऐतिहासिक महापंचायत बुलाई गई, जिसमें जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर और देश भर से हजारों लोग जुटे. चौतरफा दबाव के बीच सरकार द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग के अध्यक्ष और पटना हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनोद कुमार सिन्हा कल (25 जून) खुद भारी पुलिस बल, शाहाबाद रेंज के डीआईजी सत्य प्रकाश और डीएम तनय सुल्तानिया के साथ बिलौटी गांव पहुंचे।
न्यायाधीश ने घटना के एक-एक पहलू की जांच के लिए निम्नलिखित कदम उठाए:
घटनास्थल का मुआयना: जज साहब सीधे उस गड्ढे और स्पॉट पर गए जहां गोलियां चली थीं। उन्होंने पुलिस की थ्योरी और सोशल मीडिया पर वायरल भरत के आखिरी फेसबुक लाइव वीडियो के दृश्यों का बारीकी से मिलान किया।
पीड़ित परिवार के बयान: इसके बाद वे भरत के घर पहुंचे। भरत की मां आशा देवी और पिता काशीनाथ तिवारी ने जज के सामने रोते हुए आरोप लगाया कि उनके बेटे ने पिस्टल फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था, लेकिन पुलिस ने उसे जबरन गड्ढे में धकेलकर सीने में 5 गोलियां मार दीं।
न्याय का आश्वासन: जस्टिस सिन्हा ने पीड़ित परिवार का लिखित आवेदन स्वीकार किया, उन्हें सांत्वना दी और पूरी पारदर्शिता के साथ निष्पक्ष न्याय का ठोस आश्वासन दिया। हालांकि, मीडिया से उन्होंने दूरी बनाए रखी।
 
8 दिन बाद आधी रात को पहुंचे कप्तान: डैमेज कंट्रोल की कोशिश?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा रहस्य और चर्चा का विषय भोजपुर एसपी मिस्टर राज का रवैया रहा है। जिला मुख्यालय (आरा) से बिलौटी गांव की दूरी महज 28 किलोमीटर है। इस मामूली दूरी को तय करने में जिले के कप्तान को पूरे 8 दिन लग गए। हैरान करने वाली बात यह है कि एसपी दिन के उजाले में परिवार से मिलने नहीं गए, बल्कि आधी रात के घने अंधेरे में दबे पांव पीड़ित परिवार के घर पहुंचे।
इस सीक्रेट दौरे के दौरान एसपी ने परिजनों पर लगे मुकदमों को वापस लेने की बात कही और सुरक्षा का भरोसा दिया। लेकिन जनता के बीच यह सवाल तैर रहा है कि क्या यह पुलिस विभाग पर बढ़ते चौतरफा राजनीतिक दबाव (विशेषकर प्रशांत किशोर की महापंचायत और 15 दिनों के अल्टीमेटम) के बाद किया गया एक सोची-समझी 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिश थी? आपको बता दें कि इस मामले में जगदीशपुर के तत्कालीन डीएसपी राजेश शर्मा और थाना प्रभारी पर पहले ही हत्या (धारा 302) का मुकदमा दर्ज हो चुका है। अब पुलिस के कब्जे में मौजूद भरत तिवारी का मोबाइल फोन इस केस का सबसे बड़ा राजदार माना जा रहा है।
 
महापंचायत का अल्टीमेटम और राजनीतिक हलचल
प्रशांत किशोर और महापंचायत: बीते दिनों बिलौटी गांव में हुई एक विशाल महापंचायत (जिसमें जन सुराज पार्टी समेत कई संगठनों के लोग शामिल थे) ने सरकार को 15 दिनों का अल्टीमेटम दिया है। मांग की गई है कि पटना से भेजी गई एसटीएफ को गोली चलाने का आदेश किसने दिया, इसका खुलासा किया जाए। मांग पूरी न होने पर पटना में घेराव की चेतावनी दी गई है। 
बाबा बागेश्वर (धीरेंद्र शास्त्री) का बयान: इस मामले पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भी बयान जारी कर कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं और पीड़ित परिवार से मिलने भोजपुर आने की बात कही है। 
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला: इस कथित एनकाउंटर की निष्पक्ष केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है।
 
 
सवाल-जवाब: जो आपके मन में भी उठ रहे हैं?
सवाल 1: पुलिस इसे मुठभेड़ बता रही है, तो फिर डीएसपी और एसएचओ पर हत्या (302) का केस क्यों दर्ज हुआ?
जवाब: भरत तिवारी के आखिरी फेसबुक लाइव वीडियो (जिससे 1.6 लाख लोग जुड़े थे) और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों के अनुसार, भरत ने सरेंडर कर दिया था। आत्मसमर्पण के बाद गोली मारना कानूनन हत्या है, इसी भारी जनाक्रोश और परिजनों के आवेदन के बाद पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज कर डीएसपी को हटाया गया है।
सवाल 2: क्या रिटायर्ड जज की इस न्यायिक जांच से पीड़ित परिवार संतुष्ट है?
जवाब: पीड़ित परिवार को उम्मीद है, लेकिन बिलौटी में हुई महापंचायत और स्थानीय नेताओं की मांग है कि इस बेहद संवेदनशील मामले की जांच किसी रिटायर्ड जज के बजाय 'सिटिंग जज' (वर्तमान न्यायाधीश) या सीबीआई से कराई जानी चाहिए, ताकि स्थानीय पुलिस का दबाव जांच पर न पड़े।
 
जनता की अदालत में एक बड़ा और चुभता हुआ सवाल...
न्यायिक आयोग की टीम जांच कर रही है और मोबाइल के वैज्ञानिक साक्ष्य भी सामने आ जाएंगे, लेकिन सबसे बड़ा और गंभीर सवाल पुलिस की नीयत पर है।
अगर पुलिस का दामन बिल्कुल साफ था और एनकाउंटर असली था, तो भोजपुर एसपी को महज 28 किलोमीटर दूर बिलौटी गांव पहुंचने में 8 दिन का लंबा वक्त और आधी रात के अंधेरे का इंतजार क्यों करना पड़ा?
क्या वाकई इस एनकाउंटर की कहानी के पीछे कोई ऐसा बड़ा राज छिपा है जिसे दबाने के लिए इतना समय लिया गया, या फिर यह सिर्फ प्रशासनिक संवेदनहीनता थी?
इस पूरे मामले और पुलिस की इस कार्यशैली पर आपकी क्या राय है?
 
 
 
आरा से कोयलांचल लाइव के लिए आशुतोष पांडेय की रिपोर्ट