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आठ साल की मिशा की आंखों से अब दुनिया देखेंगे दो लोग, बेटी को खोकर भी मां ने पेश की मानवता की मिसाल

11/5/2026 11:30:06 AM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Dhanbad :  आठ साल की मासूम मिशा अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी यादें और उसकी आंखें दो लोगों की जिंदगी में नई रोशनी बनकर रहेंगी। बेटी को खोने के गम के बीच मां ने ऐसा फैसला लिया, जिसने मानवता की एक अनोखी मिसाल पेश की है। मिशा के निधन के बाद उसकी मां ने नेत्रदान कराया। अब उसकी आंखों के कॉर्निया से दो ऐसे लोगों को दुनिया देखने का मौका मिलेगा, जो लंबे समय से आंखों की रोशनी का इंतजार कर रहे थे।
 
मिशा जन्म से ही थैलेसीमिया मेजर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। इस बीमारी के कारण उसके शरीर में स्वस्थ हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता था। लिहाजा उसे नियमित रूप से रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती थी। जिस उम्र में बच्चे खेलकूद और पढ़ाई में अपना बचपन बिताते हैं, उस उम्र में मिशा का ज्यादातर समय अस्पतालों, दवाइयों और इलाज के बीच गुजरता था।
 
इलाज के लिए मां ने की हर संभव कोशिश
 
मिशा को बचाने के लिए उसकी मां ने हर संभव प्रयास किया। लगातार रक्त चढ़ाने से लेकर दवाइयों और दूसरे जरूरी उपचार तक परिवार ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। डॉक्टरों के अनुसार थैलेसीमिया मेजर का स्थायी इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट यानी स्टेम सेल ट्रांसप्लांट हो सकता है। हालांकि इसके लिए उपयुक्त दाता और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की जरूरत होती है।
 
आर्थिक तंगी परिवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई। महंगे इलाज और ट्रांसप्लांट का खर्च उठाना परिवार के लिए संभव नहीं हो सका। तमाम कोशिशों के बावजूद मिशा की जिंदगी नहीं बचाई जा सकी और महज आठ साल की उम्र में उसने दुनिया को अलविदा कह दिया।
 
बेटी के जाने के बाद भी दूसरों के जीवन में भर दी रोशनी
 
बेटी को खोने का दुख किसी भी मां के लिए असहनीय होता है, लेकिन मिशा की मां ने अपने इस दुख को दूसरों के जीवन में उम्मीद बदलने का फैसला किया। उन्होंने बेटी का नेत्रदान कराकर दो लोगों को नई जिंदगी की उम्मीद दी।
 
दरअसल नेत्रदान के तहत आंख के पारदर्शी हिस्से यानी कॉर्निया को दान किया जाता है। कॉर्निया प्रत्यारोपण के जरिए उन लोगों की आंखों की रोशनी लौटाने में मदद मिलती है, जिनकी दृष्टि कॉर्निया खराब होने के कारण चली गई है। मिशा के कॉर्निया से अब दो लोगों को दुनिया देखने का अवसर मिलेगा।
 
समाज को दिया बड़ा संदेश
 
मिशा की मां का यह फैसला समाज के लिए एक बड़ा संदेश है। उन्होंने दिखा दिया कि इंसान दुनिया से जाने के बाद भी किसी दूसरे की जिंदगी में रोशनी बन सकता है। एक तरफ जहां परिवार अपनी बेटी को खोने के दर्द से गुजर रहा है, वहीं दूसरी तरफ दो परिवारों के लिए मिशा उम्मीद की नई किरण बन गई है।
 
यह घटना थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए नियमित रक्तदान और समय पर बेहतर इलाज की जरूरत को भी सामने लाती है। साथ ही नेत्रदान के प्रति लोगों को जागरूक होने का संदेश देती है।
 
आठ साल की मिशा आज भले ही हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी आंखों से दो लोग दुनिया देख सकेंगे। एक मां ने अपनी बेटी को खोने के बाद भी दो परिवारों को खुशियां लौटाने का जो फैसला लिया है, वह मानवता की ऐसी मिसाल है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
 
 
कोयलांचल लाइव डेस्क 
 




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